Drop Down MenusCSS Drop Down MenuPure CSS Dropdown Menu
Showing posts with label Gazals. Show all posts
Showing posts with label Gazals. Show all posts

वो ख़्वाबों में रहती है पर



वो ख़्वाबों में रहती है पर कभी सामने नही आती।
महबूबा मेरी उलझी उलझी पहली है समझ ही नही आती।

ऐसी कशिश उसमे की हर गुजारिश उस तक आ कर रुक जाए।
उसकी याद में जब तक न महके सांस ही नही आती।

वो जो झुल्फों में आज गजरा



वो जो झुल्फों में आज गजरा लगा के निकले। 
उन्स-ए-रिवायत पर क़यामत ढ़ा के निकले।

हम खड़े थे दीदार-ऐ-आरज़ू लिए उनकी गली में।
वो जब करीब से निकले, तीर-ए-निगाह चला के निकले।

चलो ऐ दिल अबकी बार



          चलो ऐ दिल अबकी बार
         जरा खुद को हसाया जाए।
          थोड़ी देर के लिए ही सही 
       उस महज़बीं को भुलाया जाए।

अपने दिल की बैचेनी किस को बताऊं



अपने दिल की बैचेनी किस को बताऊं।
दर्द दिल में है कैसे किस को दिखाऊं।

खामोश हूँ, बहुत खामोश हूँ मैं।
कहने को है बहुत पर किसको सुनाऊं।

आना ही है गर तो ख़्वाब बन के आ


आना ही है गर तो ख़्वाब बन के आ।
किसने रोका है तुम्हें मेरा मेहबूब बन के आ।

तू मौजूद रहे मेरी हर एक धड़कन मैं।
आना ही है तो मेरी रगों का खून बन के आ।

मुझे यह खामोशियां अच्छी नही लगती


मुझे यह खामोशियां अच्छी नही लगती,
तुम से यह दूरियां अच्छी नही लगती।

यूँ तो सह लूं दर्द कई और भी मगर।
आंखों में यह वीरानियाँ अच्छी नही लगती।

यह और बात है कि मैं तेरे जैसी सोच नही रखता



यह और बात है कि मैं तेरे जैसी सोच नही रखता।
मैं अपने पास कोई ख्वाब कोई इल्ज़ाम नही रखता।

तुम कहते हो जाना कि मैं एक बे दिल शक़्स हूँ।
हाँ सही है मैं हिज़्र में आंसुओ से दोस्ती नही रखता।

मुझे यह खामोशियां अच्छी नही लगती



मुझे यह खामोशियां अच्छी नही लगती,
तुम से यह दूरियां अच्छी नही लगती।

यूँ तो सह लूं दर्द कई और भी मगर।
आंखों में यह वीरानियाँ अच्छी नही लगती।

टूटी बिखरी ही सही एक उम्मीद


टूटी बिखरी ही सही एक उम्मीद तो पाली है मैने।
तेरे जाने के बाद तेरी याद ही संभाली है  मैने।

तू साथ रहे न रहे यह वक़्त तो वैसे भी गुजर ही जायेगा।
बस तन्हाई के लम्हातों में तेरा साथ नही मिल पायेगा।

संभल के तुम हर बात


संभल के तुम हर बात मुझसे कहना।
ए ज़िद्द तुम अपनी हद में सदा रहना।

मुझे मंजूर है तेरी हर नादान शरारत।
तू मेरी खामोशियों से मगर वाकिफ रहना।

चाहतों की बरसात लिए


चाहतों की बरसात लिए, सितारों की सौगात लिए।
खामोश गगन के साए में हम सोए हैं तेरी याद लिए।

थोड़ी थोड़ी महकी है चांदनी कुछ यूँ बहकी है।
रात का यह जो साया है तेरी झुल्फों सा लहराया है।

भुला के इक़रार-ए-वफ़ा जाने बाली


भुला के इक़रार-ए-वफ़ा जाने बाली।
फ़क़्त मेरी तरह अश्क़ बहाती होगी।

हर शाम मेरी ही ख्याली में।
मेरी तस्वीर से आँख मिलाती होगी।

तेरे ही मैखाने में गुजर जाती है


तेरे ही मैखाने में गुजर जाती है हर रात साकी।
कुछ इस कदर मेरे घर में तन्हाई पलती है साकी।

मुड के फिर ना देखूं मैं उन दर-ओ-दीवारों को।
जहां नही मिलता मुझको चैन-ओ-सुकूँ साकी।

कुछ तो ख़लिश सी अभी बाकी है


कुछ तो ख़लिश सी अभी बाकी है।
मुझ मैं तेरी कमी सी अभी बाकी है।

चाहे तूम न देख पाओ यह शायद।
तुम बिन आँखों में नमी सी बाकी है।

हर आरज़ू आधूरी क्यों रह जाती है


हर आरज़ू आधूरी क्यों रह जाती है।
हर बार दिल में तन्हाई सी क्यों रह जाती है।

दर्द सितम बन क्यों मुझ पर छा जाता है।
हर बार यह क्यों मुझको तड़पा जाता है।

बुझी नज़र में अश्क़ बाकी है


बुझी नज़र में अश्क़ बाकी है।
सूरत तेरी का अक्स बाकी है।

रोज़ करता हूँ सितारों से तेरी बाँतें।
चाँद में अब भी तेरा नक़्श बाकी है।

ठेहर की शाम अभी थोड़ी बाकी है


ठेहर की शाम अभी थोड़ी बाकी है।
दो घडी की मुलाक़ात अभी बाकी है।

यह पल बीत गया तो क्या खबर फिर आएगा।
कुछ निगाह-ए-भरम पालना अभी बाकी है।

अपनों की बस्ती में


अपनों की बस्ती में गैरों को बसा बैठा।
नादान था मैं जो यह फर्क भुला बैठा।

एक रिश्ता जोड़ना था मुझको सो जोड़ लिया।
इस चक्कर में कितनो से नाता तोड़ लिया ।

ये बद-गुमानी मुझको


ये बद-गुमानी मुझको उलझाने लगी।
खुशबू उसकी मुझको रुलाने लगी।

मेरी दास्ताँ कुछ ऐसी बनी यारो।
बिछड़ी नींदें मेरी, रातें अब जगाने लगी।

लिखूं गर कुछ


लिखूं गर कुछ मैं सपनो की कलम से,
नाम तेरा निकलता है दिल की जुबां से,

ठहर जाते  हैं पल भी कुछ पल को,
तेरी यादों की खुशबु बिखर जाने से,