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कुछ बदलना इतना मुश्किल क्यों होता है


कुछ बदलना इतना मुश्किल क्यों होता है।
ज़िन्दगी जीना इतना मुश्किल क्यों होता है।

आग तो यहाँ लगी सबके भीतर होती है।
फिर आवाज़ उठाना इतना मुश्किल क्यों होता है।

अचल था पर्वत धरा पे


अचल था पर्वत धरा पे ।
भुर-भुरा के गिर पडा ।
हुई नीब खोखली इतनी ।
यह थर-थरा के गिर पड़ा ।

मंजिलें तो हर किसी के लिए होती हैं


मंजिलें तो हर किसी के लिए होती हैं ।
पर रास्ते कुछ ही ढूंड पाते हैं ।
कुछ ऐसे इंसान भी मिल जाते हैं ।
जिनका सफलता से कोई बास्ता नहीं
होता ।

एक मिट्टी का घरोंदा


एक मिट्टी का घरोंदा, 
एक टूटी फूटी छत,
दीवारों पर लगे कुछ टेढ़े मेढ़े पत्थर,
जो कहने को तो मेरा घर हैं,
सूखे में तो कभी पानी मिलता नहीं,