झुकती हुई निगाहों को उठाया ना कीजिये,
यूँ न हमसे नज़रों को मिलाया कीजिये,
रोग-ए-मोहब्बत हो न जाये कहीं,
खुद को मेरी जान बचाया कीजिये,
हे तजुरबा मुझको इस दर्द-ए-वफ़ा का,
यूँ ना ऐ परीवश हमको सताया कीजिये,
हुस्न-ए-वफ़ा की मूरत है तू,
यूँ न रुख से नकाब हटाया कीजिये,
मिलने की बात क्यूँ करते हो ऐ जान-ए-वफ़ा,
यूँ न जहाँ-ऐ-रसमों को रुसवा किया कीजिये,
क्या बताऊ तुम्हें कितना उलझा हूँ मैं,
यूँ न मुझे जान और उलझाया कीजिये,
तड़प जाते हैं जहाँ दिल-ओ -जान भी,
समझ न पाओगे उस आजाब को तुम,
यूँ न गुलबदन मुझको गुमराह किया कीजिये !!
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