बहुत अज़ीम हैं वो अलफ़ाज़ मुझको ,
जो आतिश बन आदमियत में मिले,
उजाड़ है क्षितिज दूर कहीं,
उबाल इतना की एहतमाम बदल सके,
कायल हो कर जो गिरे तिश्नगी,
इजितिराव-ए-आफत अब और ना आ सके,
पशेमान है वो आव-ए-चश्म भी,
जो आम हो कर इतमाम ना कर सके,
आसिर हूँ मैं जलाल का,
खलिश यह की एहतराम ना कर सके,
आसरा न दे गर आह कहीं,
परसितिश ऐसी करना जो फखीर ना कर सके,
घमंड से चूर हो जाए बादशाहत जो,
इन्कलाब में तपिश ऐसी लाना की इतिहास बन सके !!

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